बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

हवा और मै।

छत की मुंडेर पर जलाकर चराग
मै हवा से शर्त रखना चाहता हूँ।

देखो तो सही मै कितना नासमझ हूँ
हाथों से हवा का रुख बदलना चाहता हूँ।

मै जानता हूँ हार जाऊँगा मगर
देखना मै रुख हवा का चाहता हूँ।

जीत कर भी क्या मिलेगा अब मुझे
मै तो अब खुद हार जाना चाहता हूँ।

By...kumar ajeet

जिन्दगी

जिन्दगी को छेड़ मत ऐ आदमी
जिन्दगी को जिन्दगी जैसी चलन दे।

कब परिन्दो ने छुआ था आसमाॅ
इस कहानी को कहानी तू रहन दे।

गम खुशी का फलसफा है जिन्दगी
गम गलत करने को आँखें नम रहन दे।

इक जिन्दगी मे सैकड़ों है जिन्दगी 
जिन्दगी एकाध पूरी तू करने दे।
By...Kumar ajeet