छत की मुंडेर पर जलाकर चराग
मै हवा से शर्त रखना चाहता हूँ।
देखो तो सही मै कितना नासमझ हूँ
हाथों से हवा का रुख बदलना चाहता हूँ।
मै जानता हूँ हार जाऊँगा मगर
देखना मै रुख हवा का चाहता हूँ।
जीत कर भी क्या मिलेगा अब मुझे
मै तो अब खुद हार जाना चाहता हूँ।
By...kumar ajeet